
भारत के पास इन रणनीतिक खनिजों का विशाल भंडार है, जो भविष्य की तकनीक (जैसे इलेक्ट्रिक वाहन और क्लीन एनर्जी) के लिए अनिवार्य हैं। (Rare Earth Reserves)
1. वैश्विक रैंकिंग: भंडार बनाम उत्पादनRare Earth Reserves
भंडार (Reserves) के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल है, लेकिन वास्तविक उत्पादन (Production) में हम अभी भी संघर्ष कर रहे हैं।
| विवरण | भारत की स्थिति | प्रथम स्थान | अन्य प्रमुख देश |
| कुल भंडार (Reserves) | तीसरा (3rd) – 6.9 MT | चीन (44 MT) | ब्राजील (21 MT) – दूसरा |
| वार्षिक उत्पादन (2024) | सातवाँ (7th) – 2,900 टन | चीन (270,000 टन) | USA (45,000 टन) – दूसरा |
मुख्य बिंदु: भारत के पास दुनिया का लगभग 6% से 7% भंडार है, लेकिन वैश्विक उत्पादन में हमारी हिस्सेदारी 1% से भी कम है।
2. भारत में REE के स्रोत
मोनाज़ाइट रेत (Monazite Sand): भारत में अधिकांश दुर्लभ मृदा तत्व तटीय क्षेत्रों की रेत में पाए जाते हैं।
थोरियम की उपस्थिति: इस रेत में थोरियम भी पाया जाता है, जो एक रेडियोधर्मी (Radioactive) तत्व है। यही कारण है कि इसका खनन बहुत संवेदनशील माना जाता है।
3. उत्पादन कम होने के मुख्य कारण (चुनौतियां)
भारत अपनी क्षमता के अनुसार उत्पादन क्यों नहीं कर पा रहा है? इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं:
कड़े नियम (Strict Regulations): थोरियम (रेडियोधर्मी) की उपस्थिति के कारण, इसके खनन और प्रसंस्करण पर सरकार का कड़ा नियंत्रण है।
निजी निवेश की कमी: भारी नियमों और जटिल प्रक्रियाओं के कारण निजी कंपनियां इस क्षेत्र में उतरने से कतराती हैं।
पुरानी तकनीक: भारत के पास इन खनिजों को रिफाइन (शुद्ध) करने के लिए आधुनिक तकनीक और बुनियादी ढांचे की कमी है।
प्रसंस्करण सीमाएं: हम कच्चा माल तो निकाल पा रहे हैं, लेकिन उसे उच्च तकनीक वाले उत्पादों में बदलने (Refining) की क्षमता सीमित है।
4. यह भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
दुर्लभ मृदा तत्व केवल “मिट्टी” नहीं हैं, बल्कि आधुनिक दुनिया की नींव हैं। इनका उपयोग निम्नलिखित में होता है:
स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक्स के पुर्जे बनाने में।
इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की मोटरों और बैटरी में।
रक्षा उपकरण: मिसाइल गाइडेंस सिस्टम और रडार में।
क्लीन एनर्जी: पवन टरबाइन (Wind Turbines) के शक्तिशाली मैग्नेट बनाने में।
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