IIT गुवाहाटी की नई ‘ग्लेशियर मॉनिटरिंग’ तकनीक (Glacier Monitoring)

(Glacier Monitoring)

ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाली अस्थाई झीलें कभी भी टूटकर तबाही मचा सकती हैं। IIT गुवाहाटी का यह नया मॉडल ऐसी आपदाओं की भविष्यवाणी करने में सक्षम है। (Glacier Monitoring)

1. तकनीक के मुख्य घटक

इस शोध में वैज्ञानिकों ने दो मुख्य तकनीकी उपकरणों का उपयोग किया है:

  • हाई-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट इमेजरी: गूगल अर्थ की तस्वीरों का उपयोग करके ग्लेशियरों की सूक्ष्म गतिविधियों पर नज़र रखी गई।

  • डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM): इसकी मदद से पहाड़ों की ढलान, ऊँचाई और उस जगह की जटिल बनावट का सटीक नक्शा तैयार किया गया।


2. शोध की बड़ी उपलब्धियाँ

  • 492 संभावित खतरे वाले स्थान: वैज्ञानिकों ने ऐसे 492 स्थानों की पहचान की है जहाँ भविष्य में नई ग्लेशियल झीलें बन सकती हैं।

  • सटीक पूर्वानुमान: यह मॉडल न केवल झीलों को खोजता है, बल्कि यह भी बताता है कि कौन सा इलाका भौगोलिक रूप से कितना अस्थिर है।

  • जोखिम का आकलन: शोध से यह समझने में मदद मिली है कि ग्लेशियर पिघलने का पैटर्न कैसा है और इससे किन बस्तियों को खतरा हो सकता है।


3. ‘GLOF’ आपदा से सुरक्षा

प्रोफेसर अजय डाशोरा के अनुसार, यह तकनीक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (Early Warning System) का आधार बनेगी।

  • सड़कों और बांधों की सुरक्षा: जलविद्युत परियोजनाओं (Hydroelectric Projects) और सामरिक सड़कों के निर्माण के समय इन डेटा का उपयोग किया जा सकेगा ताकि उन्हें सुरक्षित स्थानों पर बनाया जाए।

  • जान-माल की रक्षा: यदि किसी झील के बनने और उसके टूटने का खतरा पहले से पता होगा, तो नीचे की बस्तियों को समय रहते खाली कराया जा सकेगा।


4. भविष्य के लिए महत्व

क्षेत्रलाभ
जल संसाधन प्रबंधनमीठे पानी के इन स्रोतों का बेहतर उपयोग और संरक्षण संभव होगा।
बुनियादी ढांचाहिमालयी क्षेत्रों में बनने वाले पुलों और टनल के लिए सटीक भौगोलिक डेटा मिलेगा।
पर्यावरण शोधजलवायु परिवर्तन का हिमालयी ग्लेशियरों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, इसका दीर्घकालिक अध्ययन संभव होगा।

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