
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा घोषित यह तकनीक भारत को सड़क निर्माण में आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ पर्यावरण को भी स्वच्छ रखेगी। (world’s first bio-bitumen producer)
1. क्या है जैव-बिटुमेन (Bio-Bitumen)?
सड़क निर्माण को समझने के लिए बिटुमेन के अंतर को जानना आवश्यक है:
पारंपरिक बिटुमेन: यह कच्चे तेल (Crude Oil) के शोधन से प्राप्त होने वाला एक काला, चिपचिपा पदार्थ है। इसे ‘डामर’ भी कहा जाता है।
जैव-बिटुमेन: इसे कृषि अपशिष्ट (जैसे पराली) और बायोमास से तैयार किया जाता है। यह पूरी तरह से स्वदेशी और पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) है।
2. तकनीक और विकास (स्वदेशी नवाचार)
इस तकनीक का विकास दो प्रमुख भारतीय संस्थानों के सहयोग से किया गया है:
संस्थान: CSIR-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRI), नई दिल्ली और CSIR-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (IIP), देहरादून।
प्रक्रिया: इसे ‘पायरोलिसिस’ (Pyrolysis) तकनीक के माध्यम से कृषि अवशेषों से तैयार किया गया है।
समारोह: नई दिल्ली में आयोजित ‘CSIR तकनीक हस्तांतरण’ कार्यक्रम में इसे आधिकारिक तौर पर पेश किया गया।
3. इस नवाचार के बड़े फायदे
यह तकनीक भारत की तीन बड़ी समस्याओं का एक साथ समाधान करती है:
पराली जलाने की समस्या: पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में पराली जलाना वायु प्रदूषण का मुख्य कारण है। अब इस पराली का उपयोग जैव-बिटुमेन बनाने में होगा, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय मिलेगी और प्रदूषण कम होगा।
आयात पर निर्भरता कम: भारत वर्तमान में भारी मात्रा में बिटुमेन का आयात करता है। स्वदेशी उत्पादन से विदेशी मुद्रा की बचत होगी और फॉसिल फ्यूल (जीवाश्म ईंधन) पर निर्भरता घटेगी।
टिकाऊ सड़कें: जैव-बिटुमेन से बनी सड़कें न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर हैं, बल्कि गुणवत्ता में भी पारंपरिक सड़कों के समकक्ष या बेहतर साबित हो सकती हैं।
4. मुख्य हाइलाइट्स
| विशेषता | विवरण |
| प्रौद्योगिकी का नाम | बायो-बिटुमेन वाया पायरोलिसिस (Bio-Bitumen via Pyrolysis) |
| मुख्य स्रोत | खेत के अवशेष (Farm Residue / Stubble) |
| घोषणाकर्ता | नितिन गडकरी (केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री) |
| वैश्विक स्थिति | भारत व्यावसायिक उत्पादन करने वाला दुनिया का पहला देश |
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