चर्चा में क्यों?
8 जून को अमेरिकी फेडरल कोर्ट (बोस्टन कोर्ट) ने ट्रम्प सरकार की H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर (करीब 95 लाख रुपए) एक्स्ट्रा फीस वसूलने वाली नीति को यह कहकर रद्द कर दिया कि यह फीस नहीं बल्कि टैक्स है, जिसके लिए संसद की मंजूरी जरूरी है।
प्रमुख बिंदु
नीति की पृष्ठभूमि: राष्ट्रपति ट्रम्प ने सितंबर 2025 में विदेशी कर्मचारियों को रखने वाली कंपनियों पर हर वीजा के लिए 1 लाख डॉलर की अतिरिक्त फीस लगाने की घोषणा की थी, जिसे 20 राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने चुनौती दी थी।
H-1B वीजा क्या है?: यह एक गैर-प्रवासी (Non-Immigrant) वीजा है, जो अमेरिकी कंपनियों को विदेशी ‘हाई स्किल प्रोफेशनल्स’ को अस्थायी रूप से नौकरी पर रखने की अनुमति देता है।
समय सीमा और शुल्क: इस वीजा की अवधि 3 साल होती है (जिसे 3 साल और बढ़ाया जा सकता है)। सामान्यतः इसकी मूल फीस $2000 से $5000 होती है।
भारत पर प्रभाव: इसका सबसे ज्यादा फायदा भारतीय IT और टेक प्रोफेशनल्स को होता है। हाल ही में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के सामने यह मुद्दा उठाया था।
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